Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

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Chapter 13 तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

इस पाठ में ‘तीसरी कसम’ नामक फ़िल्म के निर्माता कवि शैलेंद्र के जीवन और उनके कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म है। यह फ़िल्म ‘फणीश्वरनाथ रेणु की महान कृति पर आधारित है। राजकपूर ने इस फ़िल्म में अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट भूमिका अदा की है।

लेखक परिचय

प्रहलाद अग्रवाल का जन्म 1947 मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ। इन्होनें हिंदी से एम.ए की शिक्षा हासिल की। इन्हें किशोर वय से ही हिंदी फिल्मों के इतिहास और फिल्मकारों के जीवन और अभिनय के बारे में विस्तार से जानने और उस पर चर्चा करने का शौक रहा। इन दिनों ये सतना के शासकीय स्वसाशी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रध्यापन कर रहे हैं और फिल्मों के विषय में बहुत कुछ लिख चुके हैं और आगे भी इसी क्षेत्र में लिखने को कृत संकल्प हैं।

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Class 10 Sparsh Hindi Summary

राजकपूर ‘संगम’ फ़िल्म की अद्भुत सफलता से उत्साहित थे। उन्होंने एक साथ चार फ़िल्मों के निर्माण की घोषणा की – ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अजंता’, ‘मैं और मेरा दोस्त’ और ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ । राजकपूर ने सोचा भी न था कि ‘मेरा नाम जोकर’ के एक भाग को बनाने में छह साल लग जाएँगे। उन्हीं दिनों 1966 में ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म प्रदर्शित हुई । यह फ़िल्म कवि शैलेंद्र द्वारा निर्मित थी। इसमें राजकपूर ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया था।

‘तीसरी कसम’ फ़िल्म में हिंदी साहित्य की एक अत्यंत मार्मिक कृति को सैल्यूलाइड पर पूरी सार्थकता से उतारा गया है। वास्तव में यह फ़िल्म सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी । इस फ़िल्म को ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ मिला, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और कई अन्य पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में भी यह फ़िल्म पुरस्कृत हुई। इस फ़िल्म में शैलेंद्र की संवेदनशीलता पूरी ईमानदारी के साथ प्रदर्शित हुई है।

इसकी पटकथा मूल कहानी के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं तैयार की थी । कहानी का रेशा – रेशा, उसकी छोटी-छोटी बारीकियाँ भी पूरी तरह उभरकर आई थीं। इस फ़िल्म को ‘राष्ट्रपति स्वर्णपदक’ व अन्य कई पुरस्कार मिले। इस फिल्म में शैलेंद्र की संवेदनाएँ पूरी तरह उभरकर सामने आईं। राजकपूर ने केवल एक रुपये में इस फ़िल्म में अभिनय करने हेतु ‘हाँ’ कर शैलेंद्र को हैरान कर दिया। वहीदा रहमान उन दिनों लोकप्रिय हीरोइन थीं। दोनों ने धन संबंधी मुश्किल को सुलझा दिया।

शैलेंद्र बहुत भावुक व्यक्ति थे और यह राजकपूर की एक प्यार भरी शरारत थी। शैलेंद्र ने यह फ़िल्म धन तथा यश कमाने के लिए नहीं बनाई थी। उन्होंने यह फ़िल्म आत्मसंतुष्टि के लिए बनाई थी। राजकपूर ने उन्हें हर प्रकार के खतरों से सचेत कर दिया था, परंतु फिर भी उन्होंने यह फ़िल्म बनाई । यह फ़िल्म बहुत अच्छी थी, परंतु इस फ़िल्म को वितरक नहीं मिल रहे थे।

शैलेंद्र बीस सालों से फ़िल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे थे। परंतु, उन्हें इंडस्ट्री के तौर-तरीके मालूम नहीं थे। ‘श्री 420’ का एक लोकप्रिय गीत ‘दसों दिशाएँ कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति की। उन्होंने कहा कि दर्शक चार दिशाएँ तो समझ सकते हैं दिशाएँ’ नहीं। परंतु शैलेंद्र परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे। वे दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलेपन को थोपना नहीं चाहते थे। उन्होंने ही यह गीत लिखा- ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सिर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ इस फ़िल्म में साहित्य-रचना के साथ पूरा न्याय किया गया । यही रुख उनका फिल्म ‘श्री 420’ तथा ‘तीसरी कसम’ के दौरान रहा।

‘तीसरी कसम’ फिल्म में छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी ‘हीराबाई’ ने वहीदा रहमान की प्रसिद्ध ऊँचाइयों को बहुत पीछे छोड़ दिया था। शैलेंद्र ने राजकपूर जैसे महान स्टार को ‘हीरामन’ बना दिया था। अपनी मस्ती में डूबकर जब वह गीत गाता है ‘चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया’ तथा ‘लाली- लाली डोलिया में लाली रे दुलहनियाँ’ तब फ़िल्म वास्तविकता का पूर्ण स्पर्श करती है। इस फ़िल्म में दुख का सहज चित्रण हुआ है। मुकेश की आवाज़ में शैलेंद्र का यह गीत अद्वितीय बन गया है : ” सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बाँचै भाग न बाँचै कोय …. ‘

अभिनय की दृष्टि से यह फ़िल्म राजकपूर की जिंदगी की सबसे हसीन फ़िल्म है। उन्होंने इस फ़िल्म में मासूमियत का परिचय दिया है। ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर के अभिनय की जितनी प्रशंसा हुई है, उतनी ‘जागते रहो’ में भी नहीं हुई। राजकपूर ने हीरामन के चरित्र को सार्थक कर दिया है। यह चरित्र खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान का था। तीसरी कसम राजकपूर के अभिनय जीवन का वह मुकाम है, जब वह एशिया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनका अपना व्यक्तित्व एक किंवदंती बन गया था, लेकिन ‘तीसरी कसम’ में वह व्यक्तित्व पूरी तरह से हीरामन की आत्मा में उतर गया है। वह हीराबाई की फेनू-गिलासी बोली पर रीझता है, उसकी मनुआ-नटुआ जैसी भोली सूरत पर न्योछावर होता है।

Sparsh

शिल्पकार – रचनाकार, गहन – गहरा, संभवतः – शायद, अंतराल – के बीच, अभिनीत – जिसमें अभिनय किया हो, प्रदर्शित-दिखाई गई, सर्वोत्कृष्ट – सबसे श्रेष्ठ, मार्मिक – मन को छूनेवाली, सैल्यूलाइड – कैमरे की रील पर चित्र प्रस्तुत करना, संवेदनशीलता – भावुकता, शिद्दत- तीव्रता, तन्यमता-तल्लीनता, आदर्शवादी – ऊँचे सिद्धांतों में आस्था रखनेवाला, आत्मसंतुष्टि – स्वयं को संतुष्ट करना, वितरक – फ़िल्म को बाज़ार में प्रदर्शित करने की जिम्मेदारी लेनेवाले व्यवसायी, नामजद – प्रसिद्ध, लोकप्रियता – लोगों में प्रिय होना, दो से चार बनाने का गणित – पैसे को जल्दी-जल्दी बढ़ाने की कला, तराजू पर तौलना – माप-तौल करना, नावाकिफ़ – अनभिज्ञ, दृढ़-मंतव्य – पक्का विचार, उथलापन – खोखलापन, परिष्कार-सुधार, संस्कार, अभिजात्य – ऊँचे कुल का होना, दुरूह – कठिन, शत-प्रतिशत न्याय करना-पूरी तरह खरा उतरना, सूक्ष्मता – बारीक, सपनीला – सपनों में देखा गया, त्रासद स्थितियाँ – भयानक घटनाएँ, चित्रांकन – चित्र खींचना, ग्लोरी फ़ाई करना – महामंडित करना, वीभत्स – घृणित, भावनात्मक शोषण–भावनाओं को उभारकर पैसे कमाना, जीवन सापेक्ष – जीवन से संबंधित, धन लिप्सा – धन की चाह, भाव प्रवणता – भावुकता, तथ्य – सच्चाई, अद्वितीय – अनोखा, समीक्षक – गुण-दोष पर विचार करनेवाला, कला-मर्मज्ञ – कला के मर्म को जाननेवाला, किंवदंती – सुनी-सुनाई बात, पटकथा – फ़िल्म की मुख्य कथा।

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