Chapter 5 पर्वत प्रदेश में पावस Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

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Chapter 5 पर्वत प्रदेश में पावस Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

इस कविता में वर्षा ऋतु में क्षण-क्षण प्रकृति के परिवर्तित हो रहे परिवेश का चित्रण किया गया है। ये दृश्य जादू के खेल की भाँति पल-पल में परिवर्तित हो रहे हैं। मेखलाकार पर्वत अपने ऊपर खिले हुए फूलों के रंगों के माध्यम से तालाब के जल में अपना प्रतिबिंब देखकर अपने सौंदर्य को निहार रहा है। तालाब का जल दर्पण के समान प्रतीत हो रहा है। झरने झरते हए ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे पर्वत का गौरव गान कर रहे हैं। झरनों की झाग मोती की लड़ियों की भाँति प्रतीत हो रहा है।

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
मेखलाकर पर्वत अपार
अपने सहस्‍त्र दृग-सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,
-जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण सा फैला है विशाल!

शब्दार्थ: पावस-ऋतु – वर्षा ऋतु, परिवर्तित – बदलता हुआ, प्रकृति वेश – प्रकृति का रूप, मेखलाकार – मंडप के आकार वाला, अपार – जिसकी सीमा न हो, सहस्र – हज़ारों, दृग-सुमन – फूल रूपी आँखें, अवलोक – देख रहा, निज – अपना, महाकार – विशाल आकार, ताल – तालाब, दर्पण – शीशा।

कवि कहते हैं कि वर्षा ऋतु थी। वर्षा ऋतु में बादलों की उमड़-घुमड़ के कारण प्रकृति प्रत्येक क्षण अपना रूप परिवर्तित कर रही थी। कभी बादलों की घटा के कारण अंधकार हो जाता था, तो कभी बादलों के हटने से प्रदेश चमकने लगता था। पर्वतों की श्रृंखला मंडप का आकार लिए अपने पुष्प रूपी नेत्रों को फाड़े अपने नीचे देख रहा है। कवि को ऐसा लग रहा है मानो तालाब पर्वत के चरणों में पला हुआ है जो की दर्पण जैसा विशाल दिख रहा है। पर्वत पर उगे हुए फूल, पर्वत के नेत्रों के समान लग रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो ये नेत्र दर्पण के समान चमकने वाले विशाल तालाब के जल पर दृष्टिपात कर रहे हैं अर्थात पर्वत अपने सौंदर्य का अवलोकन तालाब रूपी दर्पण में कर रहा है। इस प्रकार बादल रूपी वाहन में विचरण करते हुए इंद्र अपना खेल खेल रहे थे।

कला पक्ष

  • संस्कृतनिष्ट शब्दावली का प्रयोग किया गया है|
  • पर्वत प्रदेश, परिवर्तित प्रकृति में अनुप्रास अलंकार है।
  • पल-पल, बार-बार में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • ‘दृग-सुमन’ में रूपक अलंकार तथा ‘दर्पण-सा फैला’ में उपमा अलंकार है।
  • चित्रात्मक शैली का प्रयोग हुआ है|

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्‍तेजित कर
मोती की लडि़यों सी सुन्‍दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्‍चाकांक्षायों से तरूवर
है झांक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंता पर।

शब्दार्थ: गिरि – पर्वत, गौरव – सम्मान, मद – मस्ती, आनंद, उत्तेजित करना – भड़काना, निर्झर – झरना, उर – हृदय, उच्चाकांक्षाओं – ऊँची आकांक्षा, तरुवर – वृक्ष, नीरव – शांत, नभ – आकाश, अनिमेष – स्थिर दृष्टि, अटल – स्थिर।

कवि के अनुसार पर्वतों से निकलने वाले झरने मानो पर्वत का यशोगान गाते हुए कल-कल स्वर करते हुए बहते हैं| इन झरनों की करतल ध्वनि कवि के नस-नस में उत्साह का संचार करती है। झरते हुए पानी की बूंदें मोतियों के समान सुशोभित हो रही हैं| पर्वत की चोटियों पर खड़े ऊँचे-ऊँचे वृक्ष शून्य आकाश की ओर एकटक देखते हुए ऐसे लग रहे हैं, मानो ऊँचा उठने की आकांक्षा से चिंतामुक्त कोई व्यक्ति स्थिर भाव से अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगा हुआ है।

कला पक्ष

  • संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
  • ‘झर-झर’, ‘नस-नस’, ‘उठ-उठ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • ‘झरते झाग’, ‘नीरव नभ’, ‘अनिमेष अटल’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • मोतियों की लड़ियों से सुंदर “उच्चाकांक्षाओं से तरुवर” में उपमा अलंकार है।

उड़ गया, अचानक लो, भूधर
फड़का अपार वारिद के पर!
रव-शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!
धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुऑं, जल गया ताल!
-यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।

शब्दार्थ: भूधर – पर्वत, वारिद – बादल, रव-शेष – केवल शोर बाकी रह जाना, निर्झर – झरना, अंबर – आकाश, भू – धरती, धरा, सभय – डरकर, शाल – वृक्ष, ताल – तालाब, जलद – यान (बादल रूपी वाहन), विचर-विचर – घूम-घूमकर, इंद्रजाल – इंद्रधनुष।

कवि कहते हैं कि इस पल-पल बदलते मौसम में अचानक से वह पहाड़ जो अभी तक दिखाई दे रहे थे, वह न जाने कहाँ चले गए हैं| यानी वर्षा ऋतु में बादलों के छा जाने से ऐसा लगता है, मानो अचानक बादलरूपी बड़े-बड़े पंखों को फड़फड़ा कर पर्वत कहीं उड़ गया हो। बादलों के कारण पर्वत दिखाई नहीं देता; केवल झरनों के बहने की आवाज़ सुनाई देती है। ऐसी मूसलाधार वर्षा हो रही है, मानो धरती पर आकाश टूटकर गिर गया हो। इस वातावरण में शांत स्वभाव वाले शाल के वृक्ष भी धरती के अंदर धंस गए। कोहरा इतना फैल गया है, मानो सरोवर जल गया हो और उसमें से धुआँ उठ रहा हो। इस प्रकार से बादलों के यान में बैठकर इंद्र वहाँ अपने जादू के खेल दिखा रहे हैं।

कला पक्ष

  • संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • अपार वारिद के पर में’ रूपक अलंकार और ‘विचर-विचर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • चित्रात्मक शैली और दृश्य बिंब का प्रयोग किया गया है।
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