Chapter 4 मनुष्यता Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

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Chapter 4 मनुष्यता Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

इस कविता में कवि ने मनुष्य के वास्तविक गुणों से परिचित कराया है। कवि उन मनुष्यों को महान मानते हैं जिनमें अपनों के हित चिंतन से कहीं पहले दूसरों की हित की चिंता हो। यदि मनुष्य परहित के लिए स्वयं को समर्पित नहीं करता तो उसका जीवन व्यर्थ है। प्रकृति के समस्त प्राणियों में से केवल मनुष्य के पास ही विवेक है। कोई मनुष्य मृत्यु के उपरांत भी अपने कर्मों से युगों तक लोगों के लिए याद बनकर रहे तब उसकी मृत्यु भी सुमृत्यु हो जाती है। इसके लिए कवि ने रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, क्षितीश तथा वीर कर्ण जैसे महान पुरुषों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है तथा कविता में उनका वर्णन किया है।

कवि परिचय

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 1886 में झाँसी के करीब चिरगाँव में हुआ था। अपने जीवन काल में ही ये राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हुए। इनकी शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेजी पर इनका सामान अधिकार था। ये रामभक्त कवि हैं। इन्होने भारतीय जीवन को समग्रता और प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

मनुष्यता Class 10 Sparsh Hindi Summary

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: मर्त्य – मरणशील, सुमृत्यु – गौरवशाली मृत्यु, वृथा – बेकार, पशु प्रवृत्ति – पशुओं जैसा स्वभाव।

कवि मनुष्यों को कह रहे हैं कि विचार लो यानी यह याद रखो कि मृत्य हो यानी मरणशील हो| इस धरती पर आया हर आदमी का शरीर नश्वर है इसलिए इसे याद रखो और मरने से कभी मत डरो| तुम ऐसा काम करो जिससे मरने के बाद भी लोग तुम्हें याद करें। तुम्हें गौरवपूर्ण जीवन जीना चाहिए और गौरवशाली मृत्यु को ही अपनाना चाहिए। यदि तुम्हारी सुमृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारा मरना-जीना व्यर्थ है। जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है, उसका मरना भी कोई महत्व नहीं रखता। वास्तव में यह तो पशुओं के स्वभाव जैसा है, जो केवल स्वयं का भरण-पोषण करते हैं। वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे, असल अर्थों में मनुष्य वही जो केवल खुद के बारे में ना सोचकर दूसरों के बारे में भी सोचे, उनके दुखों को समझे और उनमें काम आए|

कला पक्ष

  • खड़ी बोली का प्रयोग करने के साथ ही मृत्यु, वृथा जैसे तत्सम यानी संस्कृत से आए शब्दों का प्रयोग किया गया है|
  • ‘आप-आप’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है|

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: उदार – दयाशील, धरा – धरती, बखानती – गुणगान करती, कृतार्थ – आभारी, कीर्ति – यश, कूजती – मधुर ध्वनि करती, सृष्टि – संसार, अखंड – जो कभी खंडित न हो, असीम – सीमा रहित।

उसी दानशील व्यक्ति की कहानी को पुस्तकों और इतिहास के पन्नों में स्मरण किया जाता है जो दूसरों के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार रहता है| जो व्यक्ति दयालु होता है उसका आभार सारा संसार मानता है| दानशील व्यक्ति की ख्यातियों को ही गान किया जाता है, उनके यशों को ही संसार में याद किया जाता है| तथा उसी दानशील व्यक्ति को ही सारे संसार में पूजा जाता है| ऐसा व्यक्ति ही अखंड आत्मीय भाव असीम विश्व में भरता है। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है, जो दूसरों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देता है।

कला पक्ष

  • खड़ी बोली के साथ ही कथा, अखंड, आत्म जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग भी किया गया है|
  • सदा-सजीव, समस्त सृष्टि, कीर्ति कुजती, अखंड आत्म, उसी उदार में अनुप्रास अलंकार है।

क्षुदार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: क्षुधार्त – भूख से व्याकुल, रंतिदेव – एक परम दानी राजा, करस्थ – हाथ में पकड़ा हुआ, दधीचि – एक प्रसिद्ध ऋषि, अस्थिजाल – हड्डियों का समूह, उशीनर – गांधार देश का राजा, क्षितीश – राजा, स्वमांस – अपने शरीर का मांस, सहर्ष – प्रसन्नतापूर्वक, चर्म – चमड़ा, अनित्य – क्षणभंगुर।

इन पंक्तियों में कवि अपने कथन के पुष्टिकरण के लिए अनेक पौराणिक प्रसंगों का उदाहरण देते हैं| जैसे लंबे उपवास के बाद भूखे राजा रंतिदेव ने भी अपने हाथों में पकड़ा हुआ भोजन का थाल एक भूख से व्याकुल व्यक्ति को दान दे दिया। इसी प्रकार दधीचि ऋषि ने देवताओं के हित को ध्यान में रखते हुए, धर्म की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान कर दी। उशीनर नाम के राजा ने एक पक्षी की जान बचाने के लिए अपने शरीर का माँस काटकर दान में दे दिया था| वीर कर्ण ने भी खुशी-खुशी उस सुरक्षा कवच का दान कर दिया जो उसके जन्म से ही उसके चर्म में मौजूद था। कवि कहते हैं यह शरीर तो नश्वर है, दूसरों के हित के लिए इसका त्याग करने से क्यों डरना| वास्तव में सच्चे अर्थों में वही मनुष्य है जो परोपकार भावना से अपने जीवन को न्यौछावर कर सके|

कला पक्ष

  • पदों में दृष्टांत अलंकार है|
  • खड़ी बोली के साथ संस्कृतनिष्ट शब्दों का प्रयोग भी हुआ है|
  • भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है|

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही,
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: महाविभूति – बड़ी भारी पूँजी, वशीकृता – वश में की हुई, मही – धरती, पृथ्वी, विनीत – नम्र, लोकवर्ग – जनमानस, उदार – दयाशील।

कवि ने सहानुभूति को मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी इसलिए कहा है क्योंकि यही गुण मनुष्य को महान, उदार और प्रिय बनाता है। यह धरती हमेशा से परोपकारी मनुष्यों के वश में रही है| बुद्ध ने सांसारिक अव्यवस्थाओं का विरोध किया और संसार ने उनके दयामय संदेशों को स्वीकार कर लिया| उनके दया-प्रवाह में सांसारिक मनुष्य बहने लगे। संपूर्ण विश्व उनके सामने नम्र भाव से नतमस्तक हो गया क्योंकि उनके हृदय में परोपकार की भावना थी। कवि के अनुसार उदार मनुष्य वही है, जो परोपकार के लिए अपनी जान न्योछावर कर दे।

कला पक्ष

  • भाषा सरल, प्रभावशाली और तत्सम शब्दों से परिपूर्ण है|
  • तुकांत शब्दों का प्रयोग किया गया है|

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में
अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: मदांध – घमंड के नशे में चूर होना, चित्त – हृदय, त्रिलोकनाथ – तीनों लोकों के स्वामी, दीनबंधु – गरीबों के प्रति दयावान, विशाल हृदय – बहुत अधिक सहन शक्ति होना, अधीर भाव – धैर्य न रखना, सनाथ – अपने स्वामी का साथ होना, गर्व – घमंड, भाग्यहीन – बदकिस्मत।

कवि भूलकर भी घमंड न करने की सीख देते हुए कह रहे हैं कि हमें धन जैसी छोटी चीज़ के नशे में अंधा नहीं होना चाहिए। धन जैसी चीज़ों से अगर मनुष्य स्वयं को सनाथ समझने लगता है और मन में अहंकार पैदा करता है तो यह अनुचित है क्योंकि इस धरती पर कोई अनाथ नहीं है| त्रिलोकनाथ यानी ईश्वर का सहारा सभी को प्राप्त है। उसके होते हुए कोई भी अकेला या बेसहारा है ही नहीं। दीनबंधु यानी गरीबों पर दया करने वाले परमात्मा के हाथ बड़े विशाल हैं जो सभी की सहायता के लिए पर्याप्त हैं| इन सब के होते हुए भी अगर कोई व्यक्ति अपने आप को अकेला या बेसहारा महसूस करके बैचेन है तो वह अतीव भाग्यहीन है यानी बहुत भाग्यहीन है| वास्तव में सच्चे अर्थों में वही मनुष्य है जो परोपकार भावना से अपने जीवन को न्यौछावर कर सके|

कला पक्ष

  • भाषा सरल, प्रभावशाली और तत्सम शब्दों से परिपूर्ण है|
  • दयालु दीनबंधु में अनुप्रास अलंकार है|

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: अनंत – जिसका अंत न हो, समक्ष – सामने, स्वबाहु – अपनी बाँहें, परस्परावलंब – एक दूसरे का सहारा, अमर्त्य-अंक – देवता की गोद, अपंक – कलंक-रहित।

कवि कहते हैं अंतरिक्ष अनंत है, इसका कोई अंत नहीं है और इस असीमित अंतरिक्ष में अनगिनत देव हमारी सहायता के लिए हर समय मौजूद हैं। वे अपनी हाथों को आगे बढ़ाकर तुम्हारा स्वागत कर रहे हैं। हमें एक दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ना है| हम सभी को कलंकरहित होकर अमर गोद में जाने के लिए आगे बढ़ना चाहिए| हमें ऐसे जीवन से कोई फायदा नहीं है जिससे किसी का भला ना हो| हमें सदा अपने प्रयास से सभी का भला करना चाहिए| वास्तव में सच्चे अर्थों में वही मनुष्य है जो परोपकार भावना से अपने जीवन को न्यौछावर कर सके|

कला पक्ष

  • भाषा प्रभावशाली और संस्कृतनिष्ट शब्दों से परिपूर्ण है|
  • ‘अनंत अंतरिक्ष’ और ‘अमर्त्य-अंक’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • ‘बड़े-बड़े’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  • सभी पंक्तियों में तुकांत पद हैं।

‘मनुष्य मात्र बन्धु है’ यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: विवेक – सही-गलत का निर्णय लेने की शक्ति, स्वयंभू – परमात्मा/स्वयं उत्पन्न होने वाला, बाह्य – बाहरी, अंतरैक्य – आत्मा की एकता, प्रमाणभूत – साक्षी, व्यथा – दु:ख।

कवि कहते हैं कि मनुष्य के लिए सबसे बड़ा विवेक यही है कि वह संसार के सभी मनुष्यों को अपना बंधु समझे। हम सभी का पिता एक ही परमात्मा है। हम सभी उस ईश्वर की संतान हैं यानी हम सभी मनुष्य उसी ईश्वर का अंश हैं। अपने-अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य के बाहरी भेद अवश्य हैं, परंतु हमारी अंतरात्मा एक ही है। वेद इसका साक्षी है। वेद भी इस बात का समर्थन करते हैं। यह बड़े अनर्थ की बात है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कष्ट को दूर नहीं करता। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है जो परोपकार के लिए अपनी जान न्योछावर कर देता है।

कला पक्ष

  • भाषा प्रभावशाली और संस्कृतनिष्ट शब्दों से परिपूर्ण है|
  • ‘मनुष्य मात्र’, ‘पुराण पुरुष’ और ‘पिता प्रसिद्ध’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • सभी पंक्तियों में तुकांत पद हैं।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ: अभीष्ट – इच्छित, सहर्ष – प्रसन्नतापूर्वक, विपत्ति – मुश्किल ; कठिनाई, विन – रुकावट, अतर्क – तर्क से रहित, सतर्क पंथ – सावधान यात्री।

कवि ने जीवन का अर्थ बताने के बाद मनुष्य को संबोधित करते हुए कहा है कि वह अपने इच्छित मार्ग में खेलते हुए प्रसन्नतापूर्वक चलो। ऐसा नहीं है कि इस मार्ग में कोई मुश्किलें या बाधाएँ नहीं आएँगी। इस मार्ग में जो भी विघ्न बाधाएँ आएँ, उन्हें आगे ढकेलते हुए चलते जाओ। हमारा आपसी प्रेम-भाव कभी नहीं घटना चाहिए और न ही हमारे मन में भेदभाव उत्पन्न होना चाहिए। हम सभी एक मार्ग के सावधान यात्री बनें। इस मार्ग पर कदम बढ़ाते समय हम सब मिलजुलकर रहें। जब हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में सहायता करते हुए आगे बढ़ते हैं, तभी हम सामर्थ्य उत्पन्न कर पाते हैं। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरे के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दे|

कला पक्ष

  • भाषा प्रभावशाली और तत्सम शब्दों से युक्त है|
  • ‘विपत्ति विघ्न’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • सभी पंक्तियों में तुकांत पद हैं।
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