Chapter 6 मधुर-मधुर मेरे दीपक जल Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

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Chapter 6 मधुर-मधुर मेरे दीपक जल Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ महादेवी वर्मा द्वारा रचित एक आध्यात्मिक कविता है। कवयित्री इस कविता के माध्यम से परमात्मा से मिलन की उत्कट इच्छा व्यक्त करती हैं। इस कविता में दीपक को आस्था के प्रतीक रूप में प्रयोग किया गया है। दीपक के प्रज्वलित करने की बात कही गई है। आँधी-तूफ़ानों में भी अपने हृदय रूपी मंदिर में आस्था के दीपक को जलाकर अपने अंतःकरण के अँधेरे को दूर कर अपने प्रियतम का पथ आलोकित करना चाहती है। समस्त विश्ववासी का हृदय ईर्ष्या और घृणा की आग में जलता रहता है किंतु कवयित्री उन्हें ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाना चाहती हैं ताकि सबका कल्याण हो।

कवि परिचय

महादेवी वर्मा का जन्म 1907 को होली के दिन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ तथा प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई।विवाह के कुछ अंतराल के बाद पढ़ाई फिर शुरू की। ये मिडिल में पूरे प्रांत में प्रथम आईं और छात्रवृत्ति भी पाईं। यह सिलसिला कई सालों तक चला। बाद में इन्होने बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहा परन्तु गांधीजी के आह्वान पर सामाजिक कार्यों में जुट गयीं। उच्च शिक्षा के लिए विदेश ना जाकर नारी शिक्षा प्रसार में जुट गयीं। इन्होनें छायावाद के अन्य चार रचनाकारों में औरों से भिन्न अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया। 11 सितम्बर 1987 को इनका देहावसान हो गया।

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल Class 10 Sparsh Hindi Summary

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

शब्दार्थ: दीपक – आस्था रूपी दीपक, प्रतिक्षण – हर पल, प्रियतम – परमात्मा, ईश्वर, पथ – मार्ग, आलोकित – प्रकाशित, सौरभ – सुगंध, विपुल – विशाल, बहुत बड़ा, मृदुल – कोमल, तन – शरीर, सिंधु – समुद्र, अपरिमित – असीमित, जिसकी सीमा न हो, पुलक – रोमांच, खुशी।

महादेवी जी अपने हृदय अथवा अंतर्मन में स्थित आस्था रूपी दीपक को संबोधित करती हुई कहती हैं कि तुम लगातार जलते रहो, हर पल, हर घड़ी, हर दिन, हर समय, युग-युगांतर तक जलते रहो, ताकि मेरे परमात्मा रूपी प्रियतम का पथ – सदा तुम्हारे प्रकाश से जगमगाता रहे। कवयित्री हृदय में व्याप्त अज्ञान व अविश्वासरूपी अंधकार को दूर करने की बात कर रही है। कवयित्री अपने तन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जिस तरह धूप चारों ओर फैलकर सर्वत्र आलोकित करती है उसी प्रकार तुम भी विशाल धूप बनकर निरंतर जलो और अपनी महक सर्वत्र बिखेरो। इसके लिए भले ही उसे मोम की तरह पिघलकर बूंद-बूंद टपकना या गलना पड़े पर वह प्रकाश का सागर चारों ओर फैला दे। इस प्रकार कवयित्री संपूर्ण तन-मन से प्रभु-भक्ति में लीन हो जाना चाहती हैं।

कला पक्ष

  • तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है तथा भाषा भावाभिव्यक्ति में सफल है।
  • ‘युग-युग’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • ‘दीपक’ में छद्म रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। यह ईश्वर के प्रति अमित आस्था का प्रतीक भी है।
  • धूप और मोम में भी छद्म रूपक अलंकार है।
  • तन रूपी धूप और मोम रूपी कोमल शरीर को कवयित्री लगातार प्रभुभक्ति में लगाना चाहती हैं।

सारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता ‘मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता;
विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

शब्दार्थ: शीतल – ठंडे, नूतन – नए, ज्वाला-कण – आग के कण, विश्व – संसार, शलभ – पतंगा, सिहर – काँपना, असंख्यक – अनेक, स्नेहहीन – प्रेम रहित, नित – नित्य, उर – हृदय, विद्युत – बिजली।

कवयित्री कह रही हैं कि आज संपूर्ण विश्व में ईश्वर या परमात्मा के प्रति आस्था का अभाव है। इसलिए सारे नए कोमल प्राणी यानी मन प्रभु भक्ति से विरक्त है वे आस्था की ज्योति को संसार में ढूंढ रहे हैं पर उन्हें कहीं कुछ प्राप्त नही हो रहा है। इसलिए वह अपने आस्था रूपी दीपक से कह रही हैं कि तुम्हें आस्था के प्रति विश्वास की ज्योत देनी होगी ताकि उनके दीप प्रज्वल्लित हो जाएँ। यहाँ कवयित्री ने नूतन, शीतल उन प्राणियों को कहा है, जिनके मन में ईश्वर-भक्ति का कोई अनुभव नहीं है और प्रभु की आस्था की चिंगारी नहीं है। जग रूपी पतंगा पश्चात्ताप करता हुआ कहता है कि हाय! यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं इस प्रेम-भक्ति की लौ में जलकर अपने अहंकार को न मिटा सका। मनुष्य के हृदय में आध्यात्मिक आस्था न होने के कारण उसका हृदय ईर्ष्या और तृष्णा में जलता रहता है। इसलिए जग रूपी पतंगे को आत्माहुति देने के लिए कवयित्री अपने आस्था रूपी दीपक को सिहर-सिहर कर जलने के लिए कहती हैं।

आकाश में अनगिनत तारों को देखकर कवयित्री को ऐसा लगता है कि वे सब स्नेहरहित हैं। अपार जलराशि से पूर्ण सागर का जल जब गर्म हो जाता है, तब भाप बनकर वह बादल में परिवर्तित हो जाता है और कड़कती बिजली के साथ आकाश में घनघोर घटा के रूप में दिखाई पड़ता है। लोग आज सांसारिक ऐश्वर्य एवं वैभव से परिपूर्ण होकर भी अशांत हैं, उनका हृदय ईर्ष्या और घृणा की आग से निरंतर जलता रहता है। किसी को भी सुख-शांति नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में कवयित्री अपने हृदय में स्थित आस्था रूपी दीपक को हँसते-हँसते लगातार जलते रहने के लिए आग्रह करती हैं, ताकि प्रभु का पथ आलोकित हो और समस्त जगवासी प्रभु के पथ पर चल पड़ें।

कला पक्ष

  • तत्सम भाषा का प्रयोग किया गया है एवं भाषा भावनानुकूल तथा प्रभावोत्पादक है।
  • ‘विश्व-शलभ’ में रूपक अलंकार है।
  • ‘सिहर-सिहर’ और ‘विहँस-विहँस’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
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