Chapter 10 बड़े भाई साहब Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

Share this:

Chapter 10 बड़े भाई साहब Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary prepared by Gkrankers.com provide students with a thorough understanding of every chapter. These notes are a valuable resource for any student who wants to succeed in exams. The students can excel in their classes and feel confident in their knowledge.

Chapter 10 Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes are an important study tool for students who want to make sure they understand the specifics of every chapter in a clear and precise manner. They provide concise information that can be easily understood.

Chapter 10 बड़े भाई साहब Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

इस पाठ में दो किरदार हैं| बड़े भाई साहब और छोटे भाई (लेखक)| बड़े भाई स्वभाव से बड़े अध्यनशील थे। दिन-रात किताबें खोलकर बैठे रहते। ना पढ़ने वाले छोटे भाई को डाँटा करते और ना पढ़ने से होने वाली हानियों के बारे में भी बताते। दूसरी ओर छोटे भाई तीव्र बुद्धि के थे। पढ़ते कम थे, खेलने-कूदने में ज्यादा ध्यान देते थे। परन्तु कक्षा में प्रथम आते थे। दिनभर खेलने और ना पढ़ने के कारण अपने बड़े भाई से डाँट खाते रहते|

लेखक परिचय

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के लमही गाँव में हुआ। इनका मूल नाम धनपत राय था परन्तु इन्होनें उर्दू में नबाव राय और हिंदी में प्रेमचंद नाम से काम किया। निजी व्यवहार और पत्राचार ये धनपत राय से ही करते थे। आजीविका के लिए स्कूल मास्टरी, इंस्पेक्टरी, मैनेजरी करने के अलावा इन्होनें ‘हंस’ ‘माधुरी’ जैसी प्रमुख पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। ये अपने जीवन काल में ही कथा सम्राट और उपन्यास सम्राट कहे जाने लगे थे।

बड़े भाई साहब Class 10 Hindi Sparsh Summary

लेखक के भाई उनसे पाँच वर्ष बड़े थे, किंतु वे अपने छोटे भाई से केवल तीन कक्षाएँ ही आगे थे। उन्हें कभी-कभी एक कक्षा में एक वर्ष से अधिक समय लग जाता था। लेखक की उम्र नौ साल थी, वे चौदह साल के थे। वे लेखक पर पूरी निगरानी रखते थे। ये उनका जन्मसिद्ध अधिकार था। लेखक के बड़े भाई साहब अध्ययनशील थे। सारा दिन किताबें खोले बैठे रहते थे। वे विभिन्न प्रकार की तस्वीरें कापियों में बनाया करते थे।

लेखक का मन पढ़ाई में कम लगता था। इसलिए वह मौका पाते ही होस्टल से निकलकर मैदान में आकर खूब खेलता था। भाई साहब उपदेश देने की कला में कुशल थे। जब भी वह खेलकर आता तो वे उसे स्नेह और रोष भरा उपदेश दिया करते| लेखक भाई साहब की लताड़ सनकर रोता रहता। टाइम-टेबिल बनाकर बार-बार इरादा करता कि आगे से खब जी लगाकर पहँगा किंतु उस पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाता। प्रकृति का मोहक वातावरण लेखक को अपनी ओर खींच ले जाता। वह भाई साहब की फटकार और घुड़कियाँ खाकर भी खेलकूद का तिरस्कार नहीं कर पाता।

वार्षिक परीक्षा हुई। भाई साहब फिर से फेल हो गए। अब केवल दो कक्षा का अंतर रह गया दोनों भाई के बीच। लेखक भाई साहब से कहना तो चाहता था पर चुप रहा। पर एक दिन भाई साहब लेखक पर टूट पड़े-“इस साल पास हो गए और दरजे में अव्वल आ गए हो तो तुम्हें घमंड हो गया है। घमंड तो बड़े-बड़े का नहीं रहा, तुम्हारी क्या हस्ती है?” उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों द्वारा भाई को घमंड न करने की सलाह दी।

भाई साहब बोले-“मेरे भाई! फेल होने पर न जाओ। मेरी कक्षा में पहुँचोगे तो दाँतों पसीना आ जाएगा।” साथ ही उन्होंने आगे की कठिन पढ़ाई से डराया भी। उन्होंने इतिहास, एलजबरा के विषय में भी बताया। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने ‘समय की पाबंदी’ पर चार पन्नों का निबंध लिखने को भी कहा। स्कूल का समय निकट था इसलिए भाई साहब ने उपदेश को समाप्त किया।

फिर सालाना परीक्षा हुई। संयोग से लेखक तो पास हो गया और भाई साहब फिर फेल हो गए। कक्षा में प्रथम आने पर लेखक को खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने कठोर परिश्रम किया था परंतु बेचारे फेल हो गए। लेखक को उन पर दया आती थी। अब लेखक और भाई के बीच में केवल एक कक्षा का अंतर रह गया था। अब भाई साहब कुछ नरम पड़ गए थे। वे समझने लगे थे कि अब मुझे डाँटने का अधिकार उन्हें नहीं रहा। अब लेखक के मन में यह बात बैठ गई कि वह पढ़े या न पढ़े, पास हो ही जाएगा। पतंग लूटते पकड़े जाना व बड़े भाई का तर्क देना।

एक दिन संध्या के समय, होस्टल से दूर मैं कनकौआ लूटने के लिए दौड़ा जा रहा था। अचानक भाई साहब से मेरी मुठभेड़ हो गई। उन्होंने फिर मुझे डाँटना शुरू कर दिया। उन्होंने कहना शुरू किया कि एक ज़माना था कि लोग आठवाँ दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। उस समय आठवीं कक्षा को बहुत अहमियत दी जाती थी। तुम हो कि आठवें दरजे में आकर बाज़ारी लड़कों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। हो सकता है तुम अगले साल मेरे बराबर हो आओ, या आगे भी निकल जाओ, पर मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ । भाई साहब ने कहा कि जीवन जीने के लिए अनुभव ज़्यादा ज़रूरी है। घर का काम-काज और खर्च का हिसाब घर के बड़े-बूढ़े ही ठीक प्रकार से रख पाते हैं। तब लेखक को अपने छोटेपन का अनुभव हुआ और बड़े भाई के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई। तब भाई साहब ने लेखक को गले लगा लिया। तभी एक कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। भाई साहब लंबे थे अतः उन्होंने उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होस्टल की ओर दौड़े। लेखक भी उनके पीछे-पीछे दौड़ा|

शब्दार्थ

तालीम – शिक्षा, पुख्ता – मजबूत, तम्बीह – डाँट-डपट, सामंजस्य – तालमेल, मसलन – उदाहरणतः, इबारत – लेख, जमात – कक्षा, हर्फ़ – अक्षर, मिहनत (मेहनत) – परिश्रम, लताड़ – डाँट-डपट, सूक्ति-बाण – व्यंग्यात्मक कथन, अवहेलना – तिरस्कार, नसीहत – सलाह, फ़जीहत – अपमान, तिरस्कार – उपेक्षा, सालाना इम्तिहान – वार्षिक परीक्षा, लज्जास्पद – शर्मनाक, शरीक – शामिल, आतंक – भय, अव्वल – प्रथम, आधिपत्य – प्रभुत्व, स्वाधीन – स्वतंत्र, महीप – राजा, कुकर्म – बुरा काम, मुमतहिन – परीक्षक, प्रयोजन – उद्देश्य, खुराफात – व्यर्थ की बातें, हिमाकत – बेवकूफ़ी, टास्क – कार्य, जलील – अपमानित, प्राणांतक – प्राणों का अंत करने वाला, कांतिहीन – चेहरे पर चमक न होना, स्वच्छंदता – आज़ादी, सहिष्णुता – सहनशीलता, कनकौआ – पतंग, अदब – इज्ज़त, जहीन – प्रतिभावान, तजुरबा – अनुभव, बदहवास – बेहाल।

Share this:

Leave a Reply

Your email address will not be published.