Chapter 9 आत्मत्राण Class 10 Hindi Sparsh NCERT Summary

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Chapter 9 आत्मत्राण Class 10 Hindi Sparsh NCERT Notes

‘आत्मत्राण’ कविता मूलतः बांग्ला में लिखी गई है। इस कविता का हिंदी अनुवाद ‘आचार्य हजारी प्रसाद दुविवेदी’ ने किया है। कवि इस कविता के माध्यम से ईश्वर से शक्ति पाने की कामना करता है। वह नहीं चाहते कि ईश्वर उसके हर मार्ग, हर विपत्ति को सरल बना दें। वह ईश्वर से विपत्ति का सामना करने की शक्ति चाहते हैं, निर्भयता का वरदान चाहते हैं ताकि वह संघर्षों से विचलित न हो। वह अपने लिए ईश्वर से सहायता नहीं; आत्मबल और पुरुषार्थ चाहते हैं। सांत्वना-दिलासा नहीं, बहादुरी चाहते हैं। वे ईश्वर से कहते हैं कि तुम मुझे भय से छुटकारा न दिलाओ, मुझे सांत्वना न दो। पर इतनी कृपा करना कि मैं निडर होकर सब कुछ सहन कर सकूँ।

कवि परिचय

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 6 मई 1861 को धनि परिवार में हुआ है तथा शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। ये नोबेल पुरस्कार करने वाले प्रथम भारतीय हैं। छोटी उम्र में ही स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान इन्होने अर्जित किया। बैरिरस्ट्री पढ़ने के लिए विदेश भेजे गए लेकिन बिना परीक्षा दिए ही लौट आये। इनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित होता है। प्रकृति से इनका गहरा लगाव था।

आत्मत्राण Class 10 Sparsh Hindi Summary

विपदाओं से मुझे बचाओ ,यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख ताप से व्यथित चित को न दो सांत्वना नहीं सहीं
पर इतना होवे (करुणामय)
दुःख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले,
तो अपना बल पौरुष न हिले,
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ वंचना रही
तो भी मन में न मानूँ क्षय।।

शब्दार्थ: विपदाओं – मुसीबतों, कष्टों, करुणामय – दूसरों पर दया करने वाला, भय – डर, दुख-ताप – कष्ट की पीड़ा, व्यथित – दुखी, चित्त – हृदय, सांत्वना – तसल्ली, जय – जीत, सहायक – सहायता करने वाला, बल – शक्ति, पौरुष – पराक्रम, वंचना – धोखा, क्षय – नाश।

कवि प्रभु से कहता है कि मैं आपसे यह प्रार्थना नहीं करता कि आप मुझे संकटों से बचाओ। मैं केवल इतना प्रार्थना करता हूँ कि आप दयावान हैं, मुझ पर अपनी करुणा बनाएँ रखें ताकि मैं किसी भी संकट में मेरा मन विचलित न हो। यदि मेरा हृदय दख और कष्ट से पीडित हो. तो चाहे आप मझे सांत्वना के शब्द मत कहना। मैं अपने दुखों को स्वयं सहन कर लूँगा परंतु हे करुणामय प्रभु! इतनी कृपा करना, मुझे उन दुखों को सहन करने की शक्ति अवश्य देना, उन पर नियंत्रण करने की ताकत जरूर देना। मुझे चाहे कोई सहायता करने वाला सहायक न मिले परंतु हे ईश्वर, मुझ पर इतनी कृपा कर दो कि मेरी शक्ति, मेरा पुरुषार्थ न डगमगाए। मेरा आत्मविश्वास सदैव कायम रहे। भले ही मुझे इस संसार में हानि उठानी पड़े, भले ही मुझे कोई लाभ प्राप्त न हो, मुझे धोखा ही खाना पड़े, तब भी मेरा मन कभी दुखी न हो| मैं नहीं चाहता कि तुम प्रतिदिन हर संकट में मेरी रक्षा करो। मेरा बचाव करो, यह निवेदन नहीं है।

कला पक्ष

  • भाषा सहज एवं सरल है।
  • ‘कोई कहीं’ में अनुप्रास अलंकार है।

मेरा त्राण करो अनुहदन तुम यह मेरी प्रार्थना नही
बस इतना होवे (करुणामय)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नही सही।
केवल इतना रखना अनुनय –
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छीन-छीन में।
दुख रात्रि मे करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऎसा हो करुणामय ,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।

शब्दार्थ: त्राण – भय से छुटकारा, अनुदिन – प्रतिदिन, तरने – पार लगने, अनामय – स्वस्थ, सांत्वना – तसल्ली, अनुनय – प्रार्थना, वहन – भार उठाना, नत शिर – सिर झुकाकर, छिन-छिन – क्षण-क्षण, दुःख-रात्रि – कष्ट से भरी हुई रात, वंचना – धोखा, निखिल – संपूर्ण, मही – धरती, संशय – शक।

कवि ईश्वर से कहते हैं कि मेरी आपसे यह विनती नहीं _है कि आप प्रतिदिन मुझे भय से छुटकारा दिलाएँ। हे ईश्वर! आप केवल इतनी कृपा करें कि मुझे स्वास्थ्य प्रदान करें। मुझे रोग रहित कर दें। मैं आपसे यह प्रार्थना नहीं करता कि आप मेरा भार हलका करके मुझे तसल्ली दें। आप केवल मुझ पर इतनी दया करना कि हर दुख को मैं निडर होकर सहन कर सकूँ। सुख के क्षणों में सिर झुकाकर हर क्षण आपकी छवि को देखू। हर सुख को आपकी कृपा मानूँ। दुख से भरी रात में जब भले ही संपूर्ण पृथ्वी मुझे धोखा दे अर्थात भले संपूर्ण संसार मुझे दुतकार दे, ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी हे ईश्वर, मैं आप पर संदेह न करूँ। मुझमें इतनी शक्ति भर दें।

कला पक्ष

  • सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • ‘छिन छिन’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • छंदमुक्त कविता है।
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